मित्रो ! वासना और तृष्णा की खाई इतनी चौड़ी और गहरी है कि उसे पाटने मेंकुबेर की संपदा और इंद्र की समथर्ता भी कम पड़ती है । तृष्णा की रेगिस्तानीजलन को बुझाने के लिए साधन सामग्री का थोड़ा-सा पानी, कुछ काम नहींकरता । अतृप्ति जहाँ की तहाँ बनी रहती है । थोड़े से उपभोग तो उस ललकको और भी तेजी से आग में ईधन पड़ने की तरह भड़का देते हैं ।
मन के छुपे रुस्तम का तो कहना ही क्या? वह यक्ष राक्षस की तरह अदृश्य तोरहता है, पर कौतुक-कौतूहल इतने बनाता-दिखाता रहता है कि उस व्यामोह मेंफँसा मनुष्य दिग्भ्रांत बनजारे की तरह, इधर-उधर मारे-मारे फिरने में ही अपनीसमूची चिंतन क्षमता गँवा-गुमा दे । तृष्णा तो समुद्र की चौड़ाई और गहराई सेभी बढ़कर है । उसे तो भस्मासुर, वृत्रासुर, महिषासुर जैसे महादैत्य भी पूरी नकर सके, फिर बेचारे मनुष्य की तो विसात ही क्या है,
जो उसे शांत करके संतोषका आधार प्राप्त कर सके ।
सतयुग की वापसी--पृष्ठ-८
Published in
परम पूज्य गुरुदेव
मित्रो ! दैवी अनुग्रह के संबंध में भी लोगों की विचित्र कल्पनाएँ हैं । वे उन्हींछोटी संभावनाओं को दैवी अनुकंपा मानते रहते हैं, जो सामान्य पुरुषार्थ से अथवाअनायास ही संयोगवश लोगों को उपलब्ध होती रहती है । मनोकामनाओं तकही उनका नाक रगड़ना, गिड़गिड़ाना सीमित रहता है, जिसे वे दैवी अनुकंपामानते हैं । आत्मबल एवं आत्मविश्वास न होने से जो कुछ प्राप्त होता, है, उसेपुरुषार्थ का प्रतिफल मानकर उनका मन संतुष्ट ही नहीं होता, उनके लिए हरसफलता दैवी अनुग्रह और हर असफलता दैवी प्रकोप मात्र प्रतीत होती है । ऐसेदुबर्ल चेताओं की बात छोड़ दें तो यथाथर्ता समझ में आ जाती है पर अंततः एकही तथ्य सामने आता है कि मनुष्य जब आदशर्वादी अनुकरणीय-अभिनंदनीयकर्मो को करने के लिए उमंगों-तरंगों से भर जाता है तो वह असाधारण कदमउठाने लगता है । रावण की सभा में अंगद का पैर उखाड़ना तक असंभव प्रतीतहोने लगा था । औसत आदमी को तो हर काम असंभव लगता है । ऐसे छोटात्याग करना भी उसे पहाड़ उठाने जैसा भारी पड़ता है, जो वस्तुतः हलके-फुलकेही होते हैं और हिम्मत के धनी आदशर्वादी, जिन्हें आए दिन करते रहते हैं ।
प्रज्ञावतार की विस्तार प्रक्रिया--पृष्ठ-१६
Published in
परम पूज्य गुरुदेव
आत्मपरिवतर्न के साथ-साथ यही जाग्रत आत्माएँ विश्व परिवतर्न की भूमिकाप्रस्तुत करेंगी । प्रकाशवान ही प्रकाश दे सकता है । आग से आग उत्पन्न होतीहै । जागा हुआ ही दूसरों को जगा सकता है । जागरण की भूमिका जाग्रतआत्माएँ ही निभाएँगी । आत्मपरिवतर्न की चिनगारियाँ ही युग परिवतर्न केप्रचण्ड दावानल का रूप धारण करेंगी । यही सब तो इन दिनों हो रहा है ।जाग्रत आत्माओं में एक असाधारण हलचल इन दिनों उठ रही है । उनकीअन्तरात्मा उन्हें पग-पग बेचैन कर रही हैं, ढर्रे का पशु जीवन नहीं जिएँगे, पेटऔर प्रजनन के लिए-वासना और तृष्णा के लिए जिन्दगी के दिन पूरे करने वालेनरकीटों की पंक्ति में नहीं खड़े रहेंगे, ईश्वर के अरमान और उद्देश्य को निरथर्कनहीं बनने देंगे । लोगों का अनुकरण नहीं करेंगे, उनके लिए स्वतः अनुकरणीय आदर्श बनकर खड़े होंगे । यह आन्तरिक समुद्र मन्थन इन दिनों हर जीवित औरजाग्रत आत्मा के अन्दर इतनी तेजी से चल रहा है कि वे सोच नहीं पा रहे किआखिर यह हो क्या रहा है वे पुराने ही हैं पर भीतर कौन घुस पड़ा जो उन्हें ऊँचासोचने के लिए ही नहीं, ऊँचा करने के लिए भी विवश, बेचैन कर रहा है ।निश्चित रूप से यह ईश्वरीय प्रेरणा का अवतरण है ।
युग निमार्ण योजना दशर्न,स्वरूप व कार्य पृष्ठ-२.१४
Published in
परम पूज्य गुरुदेव
महापरिवतर्न जब भी कभी आरंभ होगा, तब उसका स्वरूप एक ही होगा कि विद्या कोजीवित-जागृत किया जाए । उसके प्रचार-विस्तार का इतना प्रचंड प्रयास किया जाए किलंबे समय से छाए हुए कुहासे को हटाया जा सके और उस प्रकाश को उभारा जाए, जो हरवस्तु का यथार्थ स्वरूप दिखाता और किसका, किस प्रकार सहयोग होना चाहिए-यहसिखाता है ।
प्राचीनकाल में साक्षरता का, भाषा और लिपि का महत्त्व तो सभी समझते थे और उसेपुरोहित-यजमान मिलजुल कर हर जगह सुचारु रूप से पूरा कर लेते थे । पुरोहितों कीआजीविका हेतु शिक्षाथिर्यों के अभिभावक दान-दक्षिणा के रूप में जो दे दिया करते थे, वहीअपरिग्रही, मितव्ययी जीवन जीने वाले ब्राह्मणों के लिए पयार्प्त होती थी ।शिक्षा-साक्षरता के लिए कोई विशेष योजना या व्यवस्था नहीं बनानी पड़ती थी ।
संजीवनी विद्या का दायित्व ऋषि वर्ग के मनीषी उठाते थे । जो अधिकारी होते थे, उन्हेंअपने आश्रमो, गुरुकुलों एवं आरण्यकों में बुलाते थे । उपयुक्त वातावरण में उपयुक्तअभ्युदय की समुचित योजना चलाते थे ।
समस्याएँ आज की समाधान कल के पृष्ठ-३४
Published in
परम पूज्य गुरुदेव
